पोरवाल समाज महंगाई और सामाजिक हिंसा का शिकार क्यों?
भारतीय समाज ने जिस तेजी से पश्चिमी देशों की तरक्की का अनुशरण किया है और जीवनशैली में ‘शरणं गच्छामिÓ की पद्धति को अपनाया है, ये चिंतन का विषय है इन बातों पर ‘समय निकालकर सोचना होगाÓ बढ़ती महंगाई और आय की सीमितता और ‘ सामाजिक हिंसाÓ अपराध जो राक्षसी मुंह फैलाये खड़े हैं। ये समाज के विपघटक है।
आज परिवारों के आय के साधन छोटे पड़ने लगे हैं एक ओर बढ़ती महंगाई दूसरी ओर कमाने वालों की कमी। आज शिक्षा के दौर में उच्च शिक्षा अच्छी नौकरी की तलाश में 25 वर्ष की उम्र तक बेटा-बेटी का खर्च अतिरिक्त बोझ (भार परिवार पर होता है बाइक-मोबाइल और पढ़ाई का खर्च)।
यदि पढ़ लिख कर नौकरी मिल गई तो विजातीय विवाह और परिवार से दूर रहकर अपना परिवार बसाने का प्रचलन। ये प्रवृति समाज के विपघटन के लिए दोषी है। इसी प्रकार बढ़ते इलेक्ट्रानिक साधनों से सामाजिक अपराध-हिंसा की प्रवृति बढ़ रही है और युवा पीढ़ी उसका अनुशरण कर सामाजिक अपराध कर बैठती है। पहले परिवारों में पिता के साथ पुत्र 15 वर्ष की उम्र से व्यापार में लग जाता था और परिवार की आय में इजाफा होता था, आज वहीं पुत्र पर अतिरिक्त खर्च होकर भार होकर दोहरी भूमिका निभा रहा है।
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भारतीय समाज को अपनी भूमिका पर विचार मंथन करने की आवश्यकता है सामाजिक हिंसा अपराध भी रोकने के प्रयासों में शासन-प्रशासन के साथ खड़े होना पड़ेगा। सामाजिकता संस्कृति और पारिवारिक स्नेह को समझने की सख्त आवश्यकता है। इसके अभाव से भी समाज को खतरनाक दौर का सामना करना पड़ सकता है। संस्कृति और समाज जीवनकाल के महत्वपूर्ण हिस्सा है इसकी आवश्यकता बनाए रखने के लिए भारतीय समाज को उपयुक्त कदम उठाने होंगे। समाज में राजनैतिक तंत्र का समावेश ना हो। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। । समाज और संस्कृति से युवाओं को जोड़ने की सख्त आवश्यकता है।
Posted By – Rajesh

