Shiv Temple : इस तीर्थ का जन्म हुआ था शिव के आंसूओं से

कटासराज मंदिर पाकिस्तान
कटासराज मंदिर पाकिस्तान

महाभारत का अभिन्न अध्याय बन चुके यक्ष-युधिष्ठिर संवाद की पावन स्थली कटासराज को सम्मानजनक स्वरूप प्रदान करने के लिए शुरू हुआ संघर्ष तीन दशक बाद रंग लाया है। भारत विभाजन के बाद पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) के जिला चकवाल की उप-तहसील चोआ सैदन शाह में रह गए इस तीर्थ स्थल पर बैशाखी एवं महाशिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालुओं का जमावड़ा बंद हो गया था।

केवल गुलाब के फूलों व लुकाठ की मंडी ही लगा करती थी। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के माध्यम से श्री सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा एवं अन्य संगठनों द्वारा की गई मांग पाकिस्तान सरकार ने 1982 में स्वीकार की। तब भारतीय तीर्थ यात्रियों का पहला जत्था बख्शी अश्चर्ज लाल बजाज के नेतृत्व में महाशिवरात्रि मनाने कटासराज गया। सभी को यह देख कर गहरा आघात लगा कि शिवलिंग ही शेष बचा है, बाकी सभी मंदिरों से मूर्तियां गायब थीं। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरी सिंह द्वारा बनवाई गई हवेली व अन्य पौराणिक इमारतें खंडहरों में बदल चुकी थीं।

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हालांकि इस तीर्थ धाम के नवीनीकरण की मांग प्रत्येक जत्थे द्वारा महाशिवरात्रि पर पाकिस्तान सरकार को दिए जाने वाले ज्ञापनों में की जाती थी लेकिन भारत सरकार ने यह मुद्दा जोरदार ढंग से तब उठाया जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और नवम्बर 1999 में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ के नेतृत्व में 25 सांसद पाकिस्तान यात्रा पर गए। इस प्रतिनिधिमंडल को कटासराज जाने का अवसर भी प्राप्त हुआ जहां पहले से भारतीय तीर्थ यात्रियों का जत्था मौजूद था। वार्तालाप के परिणामस्वरूप पाकिस्तान सरकार ऐसे सभी तीर्थस्थानों के जीर्णोद्धार के प्रस्ताव पर विचार करने को सहमत हो गई।

फिर लाल कृष्ण अडवानी जब 2005 में पाक यात्रा पर गए तब कटासराज नवीनीकरण योजना की आधारशिला रखी गई। डेढ़ दशक बाद इन पंक्तियों के लेखक को चौथी बार अब कटासराज जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ तो इस तीर्थ की भौतिक आभा को चार चांद लगे अनुभव हो रहे थे। फरवरी 2014 की महाशिवरात्रि पर न केवल 157 सदस्यीय भारतीय जत्थे में 77 महिलाओं की रिकार्डतोड़ उपस्थिति दर्ज हुई बल्कि लाहौर, इस्लामाबाद, चकवाल व नारोवाल से भी कई हिंदू सपरिवार शिवरात्रि मनाने आए हुए थे। फिलहाल ऐसे पाकिस्तानी नागरिकों को वहां ठहराने की व्यवस्था नहीं है। छ:-सात घंटे बसों में बिताने के बाद हर कोई चाहता है कि कटासराज में यात्री विश्रामघर की व्यवस्था की जाए। कटासराज के महत्व व हिंदुओं की आस्था को मान्यता प्रदान करते हुए वहां पंजाब के पुरातत्व महानिदेशक की ओर से लगाए गए बोर्ड पर अंकित किया गया है कि संभवत्: सन् 615-950 के बीच भगवान शिव से जुड़े इस तीर्थ का विकास उस स्थान पर हुआ जहां पांडव बनवास के दौरान नमक की पहाडिय़ों पर आश्रय लेने आए थे। भारत के पुरातत्व महानिदेशक अलग्जैंडर कनिंघम ने 1872-73 में सर्वप्रथम इस क्षेत्र का निरीक्षण करके सातवीं सदी के चीनी यात्री ह्यून सांग के उस निष्कर्ष की पुष्टि की कि सम्राट अशोक के जमाने में यहां 200 फुट ऊंचाई वाले स्तूप निर्मित किए गए थे जिनके इर्द-गिर्द 10 अन्य आकृतियां बनवाई गईं। कनिंघम ने सतघरा मंदिरों की तुलना 625-939 ईस्वी के मध्य कारकोटा के कश्मीरी मंदिरों से भी की थी।
अलग्जैंडर कनिंघम के हवाले से पाकिस्तान के पुरातत्व महानिदेशक ने आगे लिखा है कि कटास के पावन धाम में घाट मौजूद है जिसे अब अमर कुंड के रूप में श्रद्धा का केंद्र बिंदु माना जाता है। जब पार्वती ने दक्ष प्रजापति के महायज्ञ में शिव शंकर को आमंत्रित न करने के प्रतिरोध स्वरूप सती होने का कदम उठाया तो भगवान शिव के नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली। उन्हीं अश्रुओं के इस स्थान पर गिरने से चश्मा फूट पड़ा और इसने कटासराज के रूप में अमरत्व प्राप्त किया। इन्हीं अश्रुओं से मरु प्रदेश राजस्थान में पुष्कर राज का उदय हुआ। कटासराज में निर्मित सतघरा स्तूपों के बारे में मान्यता है कि बनवास के दौरान पांडवों ने इनमें आश्रय लिया था। अमरकुंड की लंबाई 150 फुट व गहराई 50 से 90 फुट आंकी गई है। वह वृक्ष अब मौजूद नहीं जहां से यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न पूछ कर उसके भाइयों को मूर्छा से मुक्त किया था। पंजाब (पाकिस्तान) सरकार ने ऐसी पौराणिक धरोहरों के विकास के लिए लगभग 12 करोड़ रुपए पुरातत्व विभाग को जारी किए थे। लक्ष्य दिसम्बर 2013 तक कार्य पूरा करने का तय किया गया था और काफी हद तक इसे पूरा कर लिया गया है।
अमरकुंड पर अब सुविधाजनक घाट का निर्माण कर दिया गया है। पास ही ग्लेज्ड टाइलों वाले स्नान घर का निर्माण हुआ है जिसमें स्त्रियों के लिए अलग कक्ष आबंटित है लेकिन भारतीय महिलाएं हर की पौड़ी की तरह ही अमर कुंड के घाट पर भी परिवारजनों संग खुले आकाश तले स्नान करने में रुचि रखती हैं, भले ही वहां तैनात सुरक्षाकर्मी इसे असुखद मानते हों।
मुख्य सड़क पर कटासराज परिसर के गिर्द लोहे की रेलिंग व प्रवेश द्वार का निर्माण किया गया है। सड़क के दूसरी ओर भव्य स्वागत कक्ष मौजूद है जिसमें तीर्थ यात्रियों के स्वागत हेतु सभा आयोजित की गई, विदाई समारोह भी यहीं होता है। इसमें अल्लामा इकबाल व मोहम्मद अली जिन्ना के चित्र दीवार पर लगे हैं।
शिव मंदिर व अमरकुंड तक जाने के लिए अब पत्थरों की टाइलों से सीढिय़ां व पुल बना दिया गया है जबकि अतीत में कंकड़ों से भरी पथरीली पगडंडियां थीं। मंदिर के बाहर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा रोपित पौधा भी दिखाई देता है। भारतीय विशेषज्ञों की सलाह से अमरकुंड को जोडऩे वाले श्री रामचंद्र मंदिर, श्री हनुमान मंदिर व सतघरा मंदिरों तक के रास्ते पर पत्थर की टाइलें दिखाई देती हैं। इनके भीतर फर्श भी संवार दिए गए हैं। महाराजा हरी सिंह की हवेली की छतों का पुर्निर्माण करने के अलावा मंदिरों व स्तूपों की सभी दीवारों की चूने-राखी के मिश्रण से इस प्रकार मुरम्मत की गई है कि उनकी मूल निर्माण कला प्रभावित न हो।
शिखर पर रेलिंग लगाई गई है ताकि यात्री गिर न जाएं। परिसर के बाहर मुख्य सड़क पर अजायब होटल बन गया है जो वाहन चालकों के लिए सुविधाजनक पड़ाव है। लाहौर स्थित श्री कृष्ण मंदिर के पुजारी काशीराम शर्मा माह में एक बार शिव मंदिर, कटासराज में पूजा-अर्चना हेतु आते हैं।
27 फरवरी 2014 को आयोजित अभिवादन समारोह में संभवत: पहली बार 77 भारतीय महिला तीर्थ यात्री मौजूद रहीं। महिला सशक्तिकरण के दौर से जुड़ी पंजाब (पाकिस्तान) विधानसभा में इलाके का प्रतिनिधित्व करने वाली उच्च शिक्षा संसदीय सचिव मेहविश सुल्ताना भारतीय महिलाओं से वार्तालाप खुले मन से कर रही थीं।
चौआ सैदन शाह निवासी मेहविश के पिता राजा सुल्तान अकामत 1993-2009 के बीच तीन बार विधायक रहे हैं। मुख्य अतिथि खालिद अली शाह (अतिरिक्त सचिव, वक्फ बोर्ड) सपत्नीक पधारे तो गुलाब की पत्तियों से वर्षा हुई। यूं भी तीर्थ यात्रियों के आगमन पर इंद्र देवता ने अमृत वर्षा की थी।
अभिनंदन समारोह में चकवाल के युवा अतिरिक्त आयुक्त (ए.सी.) मसव्वर अहमद खान अपनी पत्नी समीना सहित उपस्थित रहे। उनके स्नेह ने इन क्षणों को यादगारी बना दिया। इन सभी का कहना था कि कटासराज को पर्यटन व तीर्थ स्थल के रूप में और अधिक निखारने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रहेगी। वहां शीघ्र ही शापिंग काम्पलैक्स का निर्माण प्रस्तावित है।
भारतीय तीर्थ यात्रियों को पहले सर सैयद डिग्री कालेज में ठहराया जाता था, अब यह व्यवस्था गवर्नमैंट स्कूल ऑफ माइनिंग में एक सप्ताह का अवकाश घोषित करके की जाती है। तमाम प्रबंधों में पाकिस्तान हिंदू वैल्फेयर कौंसिल के अध्यक्ष डा. मनवर चंद की अहम भूमिका रहती है। उनकी पत्नी सुनीता वाघा बार्डर पर प्रवेश से लेकर विदाई तक यात्रियों की देखभाल में उत्साहपूर्वक भाग लेती हैं। श्री ननकाना साहिब से सेवाधारी विशेष रूप से बुलाए जाते हैं जबकि अन्य सामान गुरुद्वारा श्री पंजा साहिब से जुटाया जाता है। इस प्रकार अब कटासराज धाम यात्रा ङ्क्षहदू-सिख-मुस्लिम भाईचारे का अद्भुत संगम बन रही है। भारत-पाकिस्तान के असंख्य नागरिकों के बीच बढ़ता सद्भाव विभाजन-रेखा के इस पार और उस पार एक साथ महसूस किया जा रहा है।

Posted – Shiva

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