श्रीराधा का अवतरण

सुचन्द्र राजा नृग के पुत्र थे। परम सुन्दर सुचन्द्र चक्रवर्ती नरेश थे। उन्हें साक्षात भगवान का अंश माना जाता है।
पूर्वकाल में (अर्यमा प्रभृति) पितरों के यहाँ तीन मानसी कन्याएँ उत्पन्न हुई थी। वे सभी परम सुन्दरी थी। उनके नाम थे–‘कलावती, रत्नमाला और मेनका।’
पितरों ने स्वेच्छा से ही कलावती का हाथ श्री हरि के अंश भूत बुद्धिमान सुचन्द्र के हाथ में दे दिया। रत्नमाला को विदेहराज के हाथ में और मेनका को हिमालय के हाथ में अर्पित कर दिया। साथ ही विधि पूर्वक दहेज की वस्तुएँ भी दी।
महामते ! रत्नमाला से सीताजी और मेनका के गर्भ से पार्वती जी प्रकट हुई। इन दोनों देवियों की कथाएँ पुराणों में प्रसिद्ध हैं।
तत्पश्चात कलावती को साथ लेकर महाभाग सुचन्द्र गोमती के तट पर ‘नैमिष’ नामक वन में गये। उन्होंने ब्रह्माजी की प्रसन्नता के लिये तपस्या आरम्भ की। वह तप देवताओं के कालमान से बारह वर्षों तक चलता रहा। तब ब्रह्माजी वहाँ पधारे और बोले–‘वर माँगो।’
राजा के शरीर पर दीमकें चढ़ गयी थी। ब्रह्मवाणी सुनकर वे दिव्य रूप धारण करके बाँबी से बाहर निकले। उन्होंने सर्वप्रथम ब्रह्माजी को प्रणाम किया और कहा–‘मुझे दिव्य परात्पर मोक्ष प्राप्त हो।’
राजा की बात सुनकर साध्वी रानी कलावती का मन दु:खी हो गया। अत: उन्होंने ब्रह्माजी से कहा–‘पितामह ! पति ही नारियों के लिये सर्वोत्कृष्ट देवता माना गया है। यदि ये मेरे पति देवता मुक्ति प्राप्त कर रहे हैं तो मेरी क्या गति होगी ? इनके बिना मैं जीवित नहीं रहूँगी। यदि आप इन्हें मोक्ष देंगे तो मैं पतिसाहचर्य में विक्षेप के कारण विह्वल हो आपको शाप दे दूँगी।’
ब्रह्माजी ने कहा–‘देवि ! मैं तुम्हारे शाप के भय से अवश्य डरता हूँ; किन्तु मेरा दिया हुआ वर कभी विफल नहीं हो सकता। इसलिये तुम अपने प्राणपति के साथ स्वर्ग में जाओ। वहाँ स्वर्ग सुख भोगकर कालांतर में फिर पृथ्वी पर जन्म लोगी।
द्वापर के अन्त में भारतवर्ष में, गंगा और यमुना के बीच, तुम्हारा जन्म होगा। तुम दोनों से जब परिपूर्ण भगवान की प्रिया साक्षात श्रीराधिका जी पुत्री रूप में प्रकट होंगी, तब तुम दोनों साथ ही मुक्त हो जाओगे।
इस प्रकार ब्रह्माजी के दिव्य एवं अमोघ वर से कलावती और सुचन्द्र–दोनों की भूतल पर उत्पत्ति हुई। वे ही ‘कीर्ति’ तथा ‘श्री वृषभानु’ हुए हैं।
कलावती कान्यकुब्ज देश (कन्नौज) में राजा भलन्दन के यज्ञ कुण्ड़ से प्रकट हुई। उस दिव्य कन्या को अपने पूर्वजन्म की सारी बातें स्मरण थीं। सुरभानु के घर सुचन्द्र का जन्म हुआ। उस समय वे ‘श्रीवृषभानु’ नाम से विख्यात हुए। उन्हें भी पूर्वजन्म की स्मृति बनी रही।
वे गोपों में श्रेष्ठ होने के साथ ही दूसरे कामदेव के समान परम सुन्दर थे। परम बुद्धिमान नन्दराज जी ने इन दोनों का विवाह-सम्बन्ध जोड़ा था। उन दोनों को पूर्वजन्म की स्मृति थी ही, अत: वह एक-दूसरे को चाहते थे और दोनों की इच्छा से ही यह सम्बन्ध हुआ।
श्रीकृष्ण ने अपनी तेजोमयी पराशक्ति श्री राधा का वृषभानु की पत्नी कीर्ति रानी के गर्भ में प्रवेश कराया। वे श्री राधा निकुञ्ज प्रदेश के एक सुन्दर मन्दिर में अवतीर्ण हुईं।
उस समय भाद्रपद का महीना था। शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि एवं सोम का दिन था। मध्याह्न का समय था और आकाश में बादल छाये हुए थे। देवगण नन्दनवन के भव्य प्रसून लेकर भवन पर बरसा रहे थे।
उस समय श्री राधिका जी के अवतार धारण करने से नदियों का जल स्वच्छ हो गया। सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न-निर्मल हो उठीं। कमलों की सुगन्ध से व्याप्त शीतल वायु मन्द गति से प्रवाहित हो रही थी।
शरत्पूर्णिमा के शत-शत चन्द्रमाओं से भी अधिक अभिराम कन्या को देखकर गोपी कीर्तिदा आनन्द में निमग्न हो गयीं। उन्होंने मंगल कृत्य कराकर पुत्री के कल्याण की कामना से आनन्ददायिनी दो लाख उत्तम गौएँ ब्राह्मणों को दान की।
जिनका दर्शन बड़े-बड़े देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, तत्त्वज्ञ मनुष्य सैकड़ों जन्मों तक तप करने पर भी जिनकी झाँकी नहीं पाते, वे ही श्री राधिका जी जब वृषभानु के यहाँ साकार रूप से प्रकट हुईं और गोप-ललनाएँ जब उनका लालन-पालन करने लगी, तब सर्वधारण एवं सुन्दर रत्नों से खचित, चन्दन निर्मित तथा रत्न किरण मण्डित पालने में सखी जनों द्वारा नित्य झुलायी जाती हुई श्री राधा प्रतिदिन शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की कला की भाँति बढ़ने लगी।
॥जय जय श्री राधे॥
॥ राणा जी खेड़ांवाली॥
एड महेश चौधरी द्वारा