Hole in The Wall – सुगाता मित्रा की कहानी

यह एक एक्सपेरिमेंट नहीं, एक क्रांति थी जिसने पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या स्कूल के बिना भी सीखा जा सकता है?

शुरुआत – 1999, दिल्ली:

प्रोफेसर सुगाता मित्रा NIIT में वैज्ञानिक थे। उनका ऑफिस दिल्ली के कालकाजी में था, जहाँ झुग्गी-झोपड़ी के गरीब बच्चे रहते थे।

एक दिन उनके मन में सवाल आया – अगर इन बच्चों को कभी स्कूल नसीब नहीं हुआ, क्या ये कंप्यूटर चला सकते हैं?

उन्होंने अपने ऑफिस की दीवार में छेद करके एक कंप्यूटर लगा दिया, जिसका स्क्रीन और कीबोर्ड बाहर झुग्गी की तरफ था, और उसमें इंटरनेट चालू कर दिया। कैमरा चुपके से रिकॉर्डिंग कर रहा था।

उन्होंने बच्चों को कुछ नहीं सिखाया, बस छोड़ दिया।

क्या हुआ?

कुछ घंटों में ही 8-13 साल के बच्चे जिन्होंने कभी अंग्रेजी नहीं पढ़ी थी, कंप्यूटर के आसपास जमा हो गए।

– 8 घंटे बाद एक बच्चे ने इंटरनेट ब्राउज करना शुरू कर दिया
– वे खुद ही माउस का नाम “सुई” रखकर एक दूसरे को सिखाने लगे
– कुछ दिनों में वे अंग्रेजी के शब्द, कार्टून बनाना, गेम खेलना, गाने सुनना सब सीख गए

जब उनसे पूछा गया “कैसे सीखा?” तो एक बच्चे ने कहा – “कंप्यूटर को तो अंग्रेजी आती है, हमें भी थोड़ी-थोड़ी सिखा दी।”

इससे मित्रा ने क्या साबित किया?

1. बच्चे खुद से सीख सकते हैं – अगर उत्सुकता हो तो टीचर की जरूरत नहीं, इसे उन्होंने Minimally Invasive Education कहा।
2. SOLE (Self Organized Learning Environment): उन्होंने कई स्कूलों में एक बड़ा स्क्रीन लगाकर बच्चों को ग्रुप में खुद से सवालों के जवाब ढूंढने को कहा, और बच्चे कोर्स की किताबों से भी बेहतर सीख गए।

इसी काम के लिए उन्हें 2013 में 1 मिलियन डॉलर का TED Prize मिला।

इस कहानी का सार – बच्चा खाली घड़ा नहीं है जिसे भरना है, बल्कि आग है जिसे जलाना है।

एड महेश चौधरी द्वारा