Report: बंदरों की संख्या तेजी से कम हो रही

देश के जाने माने वैज्ञानिक प्रोफेसर मेवाराम की रिसर्च

The number of monkeys is decreasing rapidly.
The number of monkeys is decreasing rapidly.

आजकल हाइवे और दूसरे सडक़ मार्गों और यहां तक रहवासी बस्तियों में बंदरों के झुंड के झुंड नजर आते हैं। इन झुंडों को देखकर हम समझते हैं कि बंदरों की संख्या इतनी ज्यादा हो गयी है कि वो जंगलों से रहवासी इलाकों की तरफ रूख करने लगे हैं। लेकिन हकीकत कुछ और ही है और प्रकृति को लेकर चिंता बढ़ाने वाली है। देश के जाने माने जीव वैज्ञानिक प्रोफेसर मेवासिंह ने पिछले 35 सालों से बंदरों पर अध्ययन किया है और उनके मार्गदर्शन में काम करने वाले शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन को आगे बढ़ाया है। जिसमें पाया गया है कि बंदरों की संख्या तेजी से कम हो रही है।
उनका दावा है कि, 80 फीसदी बंदर खत्म हो चुके हैं, क्योंकि जंगलों में बंदरों को खाने के लिए कुछ नहीं बचा है, इसी वजह से वो बस्तियों और खेतों की तरफ रूख कर रहे हैं और अगर जंगल से बंदर खत्म हो गए, तो धीरे-धीरे जंगल खत्म हो जाएगा। क्योंकि जंगल के विस्तार में बंदरों की अहम भूमिका होती है और फल खाकर सबसे ज्यादा उनके बीजों का फैलाव बंदर ही करते हैं।

सागर विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग में व्याख्यान देने पहुंचे प्रोफेसर मेवासिंह देश के जाने माने जीव वैज्ञानिक हैं। जिनका जीव विज्ञान और खासकर पशु व्यवहार को लेकर शोध में देश और दुनिया में बड़ा नाम है। जो मैसूर यूनिवर्सिटी के विशिष्ट प्रोफेसर हैं, जिनके 200 से ज्यादा रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुके हैं। उनके द्वारा संपादित मकाक सोसाइटीज – ए मॉडल फॉर द स्टडी ऑफ सोशल ऑर्गेनाइजेशन कैम्ब्रिज यूनिवर्सटी ने प्रकाशित की है। प्रोफेसर मेवा सिंह दुनिया भर में प्राइमेटोलॉजिस्ट (बंदर विशेषज्ञ) के रूप में जाने जाते हैं और उन्होंने बंदरों के व्यवहार पर 35 साल के आंकड़े इक_ा किए हैं। उन्होंने मुख्य रूप से कर्नाटक के मध्य पश्चिमी घाट की अघनाशिनी और शरावती नदियों के जंगलों में बंदरों के प्राकृतिक आवास पर अध्ययन किया है। जिसको उनके शिष्य लगातार आगे बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा कर्नाटक के शहरी क्षेत्रों में भी बंदरों के व्यवहार और भोजन पर अध्ययन किया है।
क्या कहती है प्रोफेसर मेवासिंह की रिसर्च
प्रोफेसर मेवासिंह का कहना है कि, उनके पास 35 साल का रिकार्ड इक_ा है, जिसके आधार पर हमारे देश में 80 फीसदी बंदर कम हो गए हैं। आजकल सडक़ों, हाइवे और रहवासी इलाकों में बंदरों के झुंड दिखते हैं, तो लोग बोलते हैं कि हजार बंदर दिखाई दिए। 10 बंदर नजर आते हैं, तो बोलते हैं कि 100 बंदर घूम रहे हैं। उनका कहना है कि, बंदर हमेशा नजर आते हैं और वो हमारे सामने घूमते रहते हैं। ज्यादातर समूह में नजर आते हैं, सभी को लगता है कि बहुत घूम रहे हैं। जैसे मैंने रिकार्ड रखा हुआ है। 1000 वर्ग किमी का 35 साल पुराना रिकार्ड रखा हुआ है। जहां बार-बार मेरे स्टूडेंट जाते हैं और उस रिकार्ड के हिसाब से अध्ययन करते हैं। बहुत सी जगह ऐसी है, जहां 100 फीसदी बंदर खत्म हो चुके हैं। बंदरों की संख्या कम होने का कारण हैं कि उनके जीवन के लिए संसाधन ही नहीं बचे हैं। खाने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वो खेतों में आते हैं, तो वहां लोग मार देते हैं। जब उनके जीने के संसाधन ही खत्म हो गए, तो क्या करेंगे, बंदर भूखे मर जाएंगे या फिर मानव से संघर्ष होगा। लोग जहरीले पदार्थ देते हैं, उनके खाने में जहर मिला देते हैं।
प्रकृति और जंगल निर्माण में बंदरों का योगदान
प्रोफेसर मेवासिंह का कहना है कि, प्रकृति और खासकर जंगलों के विस्तार के मामले में बंदरों का विशेष योगदान है। बंदर पारिस्थितिक तंत्र और जंगलों के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। बंदरों को जंगलों का माली भी कहा जाता है, क्योंकि ये जंगल में पायी जाने वाली वनस्पतियों के संरक्षण और उन वनस्पतियों के फिर से उत्पादन में बीज के फैलाव में अहम भूमिका निभाते हैं। जंगल में बंदरों का मुख्य भोजन फल होता है। बंदर फल खाकर उनके बीज दूर-दूर तक फैला देते हैं, जिससे जंगल विकसित होता है। बंदर फल खाते-खाते काफी दूर तक चले जाते हैं और उनके बीज यहां-वहां फेंक देते हैं। ऐसे में वनों का विस्तार तेजी से होता है। अगर किसी जंगल में बंदर मौजूद नहीं है, तो माना जाता है कि जंगल बिगड़ रहा है और जल्द खत्म हो सकता है। तरह-तरह के फल और कई पौधों की पत्तियां खाने के कारण वो वन की जैव विविधता तैयार करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
बंदर नहीं रहेंगे तो क्या होगा monkeys is decreasing rapidly
अगर बंदर खत्म हो जाएंगे तो क्या होगा के सवाल पर प्रोफेसर मेवासिंह कहते हैं कि, बंदर के खत्म होने से बहुत नुकसान होगा। सवाल ये है कि कि अगर प्रकृति से मानव खत्म हो जाएगा, तो क्या होगा। प्रकृति में विकास हुआ है, हम उसे सहज नहीं ले सकते हैं। सवाल ये है कि लोगों को बंदरों की इकोलॉजिकल वैल्यू (पारिस्थितिक मूल्य) पता ही नहीं है। मेरी एक स्टूडेंट ने रिसर्च की है कि बंदर जंगल में बीज फैलाव करते हैं। कहां से कहां ले जाकर बीज फैला देते हैं। जंगलों में हमने रिसर्च की है, कि जहां बंदर हैं, वहां जंगल है। जहां बंदरों के समूह नहीं है, वहां जंगल फिर से नहीं हो रहा है। बंदर जंगल में फल खाते हैं और उनके बीज फैला देते हैं, जिससे नए पेड़ आते हैं। इसके अलावा ऐसे और भी कई काम हैं, जो बंदर जंगल में करते हैं।

source – ems