इन्दौर में क्रांतिकारी शताब्दी वर्ष 1924 से 2024 गणेशोत्सव
अनंत चतुर्दशी पर विशेष

भारतीय संस्कृति में लोकनेता लोकमान्य तिलक ने गणेशजी की भक्ति और शक्ति के संयोग से स्वराज्य के विचारशील सिपाही बनाने का संकल्प लिया। सन् 1893-94 में लोकमान्य तिलक ने गणोशोत्सव और शिवाजी उत्सव को सार्वजनिकता प्रदान की। इसी प्रभाव से इन्दौर में भी गणोशोत्सव सन् 1896 से शुभारंभ हुआ। कृष्णपुरा पुल के पश्चिमी किनारे पर बनी राजाओं की छत्री के आखरी छोर पर भगवान दत्तात्रय का प्राचीन मंदिर है। उस जमाने में नदी में लबालब जल भरा होता था। घाट की साफ सीढ़ियों पर पढ़े-लिखे लोग, प्रकृति प्रेमी और धर्म प्रेमी जनसमूह एकत्र होते थे। इन्हीं समूहों में होल्कर कॉलेज के देशभक्त प्रोफेसर व विद्यार्थियों का भी एक समूह था। अन्य विद्यार्थी भी आते थे। indore anant chaturdashi jhanki
रिजेंसी कौसिल द्वारा ‘‘दरबार-प्रस्ताव‘‘ में भी गणेशोत्सव को राजद्रोह माना गया। इसी वर्ष जनता ने गणेश प्रतिमाओं का सामूहिक जुलूस निकालकर विसर्जन करने का निश्चय किया। मोहल्ले-मोहल्ले से गणेशजी की प्रतिमा जुलूस के रूप में कृष्णपुरा बोझाकोट प्रांगण में एकत्रित हुई। झांझ, मजीरे, ढ़ोलक, लेझिम और करताल बजाते हुए लोग गणेशजी की जय-जयकार कर रहे थे। जगह-जगह पुलिस तैनात थी। अंग्रेज आई.जी.पी.मि. सीग्रिम बदहवास सा घूम रहा था। इससे विसर्जन जुलूस में ज्यादा जोश था। जुलूस में कभी-कभी अंग्रेज विरोधी नारे लग जाते थे। indore anant chaturdashi jhanki 2024
रिजेंसी कौंसिल के कठोर कानून और दमन के कारण 2 वर्षो तक गणेशोत्सव मनाया ही नही जा सका। सन् 1911 में वाइसराय ने रिजेंसी कौंसिल को समाप्त कर दिया और महाराजा तुकोजीराव होलकर को सभी राज्याधिकार लौटा दिए। रिजेंसी कौंसिल की मुर्दाबादी पर इन्दौर की जनता में खूब-खुशियां मनाई गई। महाराजा तुकोजीराव और यशवंतराव होलकर के चिरायू होने के नारे लगाये गये। वंदे मातरम् भी जोश के साथ गुंजाया गया और इन्कलाब जिंदाबाद भी।
1922 के बाद गणेशोत्सव अलग-अलग मोहल्लों में मनाया जाने लगा। इमली बाजार, गांधी रोड़ रामप्याउ के सामने स्थित दामुअण्णा उपहार गृह, मल्हारगंज में स्व. गवारीकर का बाड़ा, कृष्णपुरा दत्तात्रय मंदिर, आड़ा बाजार में मल्हारराव होल्कर का बाड़ा, व अनंतनारायण मंदिर तथा कंुवर मंडली में खुटाल साहब के बाड़े में गणेशोत्सव होने लगा। मर मिटने की भावना उत्पन्न करने वाले गीत, प्रहसन, समूह गान के साथ शास्त्रीय संगीत, प्रवचन व राष्ट्रीय आंदोलन पर भाषण होते थे। गणेशोत्सव को विशेष रूप से महाराष्ट्रीयन समाज ने उत्तेजना दी, अतः मराठी कार्यक्रम अधिक होते थे। मराठी भाषा-भाषी जनता की बसाहट जेलरोड़ तोपखाना, स्नेहलतागंज, कृष्णपुरा, नंदलालपुरा, जूना तुकोगंज, आदि में अधिक होने के कारण गणेशोत्सव के कार्यक्रम शालीनता से व्यवस्थित हो सकें। इसके लिए सभागृह बनाने का निर्णय लिया गया। परिणामस्वरूप जेलरोड़, स्नेहलतागंज में गणेश मंडल भवन की स्थापना महारानी चन्द्रावती द्वारा की गई।
गणेशोत्सव की सार्वजनिकता का शहरी माहौल इन्दौर की कपड़ा मिलों में भी निर्मित हुआ। मिल मजदूरांे ने स्वयं के चंदे से गणेश स्थापना और जुलूस की शुरूआत की। मिलों में भी कई कार्यक्रम होते थे, परंतु मजदूरों को सबसे ज्यादा अच्छा कार्यक्रम लगता था राम दंगल का। जिसमें सीधे सरल शब्दों में राष्ट्रीय नेताओं की महानता, अंग्रेजी की क्रुरता और शहीदों की प्रशंसा में गीत गाये जाते थे। सन् 1942 से 1946 तक भारत छोड़ों आंदोलन में इन्दौर प्रजा मंडल व कांग्रेस के सभी नेता जेलों में बंद थे। तब इन राम दंगल के गीतों ने ही इन्दौर में राष्ट्रीय चेतना जगाई रखी।

पिछले 50 वर्षो से इन्दौर के गणेश विसर्जन की झाकियां तो अपना गौरव देशभर में बढ़ा रही हैं, परंतु उत्सव के नाम पर मोहल्लों में होने वाले रात्रि कार्यक्रमों के प्रति जनता में निरंतर अरूचि बढ़ती जा रही हैं। यही कारण है कि, शहर में दुर्गोत्सव दिन दूने हो रहे हैं क्योंकि इसमें भाग लेने वाले कलाकर बालिकाए मोहल्ले में ही रहती हैं और सज-धज कर गरबे में आ जाती हैं। गरबे और गरबा नाटिका के अलावा कोई कार्यक्रम इसमें नहीं होता। गणेशोत्सव के कार्यक्रमों में सधाुर करके इसे पुनः राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रोत्थान की प्रेरणा देने वाला उत्सव बनाये जाने की जरूरत हैं।
सन् 1925-26 में हुकुमचंद मिल के कर्मचारी जेलरोड़वासी मोरेश्वर (मौरू भैया) पुराणिक ने मिल के अहाते में ही मिल मजदूरों के स्वेच्छिक सहयोग से गणेशोत्सव का श्रीगणेश किया। 20-25 श्रद्धालु श्रमिकों ने पूर्ण आस्था से गणेश प्रतिमा झांझ, मंजीरों की ध्वनि के साथ लाकर स्थापित की गई। कोई विशेष कार्यक्रम नहीं होता परंतु मिल के श्रमिक मध्यांतर में गणेश प्रतिमा के पास एकत्र होते है। मौरू भैया पुराणिक उन्हें शहर के जेलरोड़, रामबाग, सुनारवाड़ा, गणेश मण्डल आदि में होने वाले कार्यक्रमों की रोचक जानकारियां देते। उस जमाने में मिल के अधिकारी श्री पंथ वैद्य (जिनकी स्मृति में गणेशोत्सव मनाने वाली प्रसिद्ध पंथ वैद्य कालोनी विख्यात है) साहब ने उत्सव को भजन-कीर्तन से जोड़ा। उन्हीं की प्रेरणा से सन् 1927 में हुकुमचंद मिल के समाजसेवी श्रमिकों ने ‘‘श्रीगणेश विसर्जन जुलूस‘‘ का बीजारोपण किया। यही विशाल वटवृक्ष के समान कपड़ा मिलों से निकलने वाली झाकियों के रूप में हम सब वर्षो से अनंत चतुर्दशी त्यौहार पर देखते हैं। मिलें बंद होने से जुलूस की चमक फिकी पड़ गई। पिछले 2-3 वर्षो से नगर निगम विकास प्राधिकरण, विन विभाग अन्य विभाग भी झाकियां निकाल रहे हैं।

विसर्जन जुलूस की श्रीगणेश झाकियां अनंत चतुर्दशी के बाद तीन दिन तक मिलों में दर्शनार्थ रखी जाने के कारण इन्दौर की 50 प्रतिशत जनता मिलों में जाकर ही अच्छी तरह 10-20 मिनिट खड़ी होकर झाकियां निहारने में अधिक आनंद पा लेती हैं। विसर्जन जुलूस मंे तो धक्के-मुक्के, भागदौड़, धींगा-मस्ती के साथ होने वाले शोरगुल के कारण अधिकांश जनता घबराकर घर पर ही रहना पसंद करती रही हैं। घर के सुनेपन में चोरी-डकैती का खतरा भी तो रहता है। झाकियों के काफी देरी से निकलने के कारण रात 2-2 बजे तक पराये घर या होटलो, फुटपाथों पर बैठे-बैठे हाथ-पांव अकड़ जाते हैं। पानी, पेशाब की परेशानी रहती हैं और नींद की उबासियां भी आने लगती हैं। हर मिल की झांकी ने 1-1, 2-2 घंटे की लेटलाली भी दुखदाई होती रही हैं।
इन्दौर तथा दूर-दूर के लाखों नर-नारी पिछले वर्षो मिलों में श्रीगणेश विसर्जन की विराट शोभायात्रा (जुलूस) की अनुपम, अद्भुत दृश्यावली के साक्षात दर्शन (दूरदर्शन अर्थात् केबल दूर से दर्शन) के लिए खुशी-खुशी अनेक आपदाऐं सारी रात उठाते रहे हैं। भारतीय स्वतंत्रता प्राप्ति के ‘गौरव पर्व‘ की अमर कीर्ति के रूप में इन्दौर की आन-बान-शान और पहचान मंे बेजोड़ मजदूरों की ओर से भेंट की गई यह सांस्कृतिक धरोहर हैं। यह परम्परा समाप्त न होने पाये।
गणतंत्र के देयता श्रीगणेश से अभ्यर्थना है। भारतीय आजादी को हर प्रकार के आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक संकटों से षडयंत्रों से बचाना। मजदूरों ने इन झाकियों के द्वारा भारतीय धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक महानताओं के साथ राष्ट्र में भी व्याप्त अनाचार, भ्रष्टाचार, लूट, हत्या, साम्प्रदायिक दंगा आदि को राष्ट्रीय कलंक मिटाने के लिए डंके की चोट उन बुराईयों को झाकियों में दर्शाया है। इन झाकियों को झरोखों में बैठे-बैठे निहारने वालों में राष्ट्रीय एकता, साम्प्रदायिक सद्भावना, सर्वधर्म समभाव, सर्वजन हिताय और (बहुजन हिताय नहीं), सर्वजन सुखाय का मंत्र भी झाकियों के द्वारा गंूजाया गया है। अनपढ़, अशिक्षित, निरीक्षर (आज भी साक्षर नहीं हो पाये) माने जाने वाले इन्दौर की कपड़ा मिलों के मेकेनिकल और मशीनरी में ऐसी (मास्टरी) विशेषता का जिंदा जादू दिखाने वालें मजदूरों ने अच्छे-अच्छे बुद्धिवादी, न्यायवादी, विज्ञानवादी (बकवादी) समाज शास्त्री और राजनिति वेत्ताओं को अपनी कला से चमत्कृत कर दिया है।
मिलों की झाकियों में रामायण और महाभारत का चित्रात्मक दर्शन भी प्रेरणापद रहता हैं। राष्ट्रीय आंदोलन के नजारे भी।
राजनिति में अपने तरह का अनूठा तेवर रखने वाले इन्दौर के महान मजदूरों ने इन झाकियों में रामायण और महाभारत के अनेक पावन प्रसंगों के चलित दृश्यों से ज्ञान परोसा है। राम वन गमन, भरत मिलाप, अहिल्योद्वार, धनुष यज्ञ, राम-सीता विवाह, सीता हरण, जटायु वर्ग, भी हनुमान का संजीवनी लाना, राम-रावण युद्ध, रामेश्वरम में शिव पूजन आदि दृश्यों से महान लोक संत, राष्ट्र संत महाकवि, तुलसीजी की रामायण के अनेक प्रसंगों को ‘‘खुली आंखों‘‘ देखेने का कमाल दिखाया है। तुलसी ने जिन भावनाओं को शब्दों की रसमयता प्रदान की है उन सबकों स्वभाविक चरित्र में चत्रित हो चलित किया गया है। मजदूरों के अरमानों, हसरतों और तमन्नाओं ने अपने अनोखें ढ़ंग से तराशा था ‘‘सच्चे लोकोत्सव‘‘ के रूप में श्री गणेशोत्सव को प्रौढ़ शिक्षा और साक्षरता का ढ़ोल पीटने वालों को चुनौती देती है। कपड़ा मजदूरों द्वारा बनाई गई सामाजिक सुधारों की गर्जना करने वाली यह झाकियां मजदूरों को बर्बाद करने वाली तीन बुराईयां हैं। सट्टा, सिनेमा, शराब इन पर कड़ा प्रहार (संदेशातमक-उपदेशात्मक) भी इन झाकियों में खुलेआम किया गया है। मजदूरों में फैली गरीबी, भूखमरी, लाचारगी, बेकारी, बेरोजगारी और छठनी तक के मर्मभेदी करूणामय दृश्य इन झाकियों में देखने को मिले है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, का. विनोबा भावे, लोकमान्य तिलक, सुभाषचंद्र बोस, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, इंदिरा गांधी की कुर्बानियों को दिखाकर इन झाकियों ने राष्ट्रीयता की कीर्ति भी स्थापित की हैं।
नदी के दोनों किनारों पर खड़ें हजारों, हजार नर-नारियों ने जयकार की। सुर्यास्त के पूर्व ही प्रतिमा विसर्जन कर जुलूस के सभी लोग शाम होने के पूर्व ही मिल पहंुचना जरूरी समझते थे क्योंकि ये वह दिन थे जब इन्दौर की सड़कों पर आधे-आधे फर्लांग की दूरी पर ‘सड़क लालटेन‘ लगते थे। तेल कम भरा जाने के कारण रात 8-9 बजे स्वयं बुझ जाते थे।
राय बहादुर सेठ कन्हैयालाल भंडारी मिल प्रबंधकों व कर्मचारियों ने पहली बार सन् 1928 में बैंड-बाजों के साथ जुलूस निकाला। अखाडे़ की लेझिंम पार्टी भी थी और भजन मंडलियां भी जुलूस में थी।
झांकी सम्राट श्री मिश्रीलाल वर्मा
राजकुमार मिल ने सन् 1943 में 5 फीट लंबे चूहे पर मिल की श्रीगणेश प्रतिमा की प्रभावशाली झांकी निकाली जिसमें चूहे की बड़ी-बड़ी लाल आंखें चमकती थी। आंखों के श्वेत शाम पटल की जगह लाल-लाल लट्टू लगाये गये थे। यह लट्टू आंख मिचौली खेलते थे, जलते और बंद होते रहते थे। श्रीगणेशजी के मूषकराज चूहे महाराज का ही सारी इन्दौर में बोलबाला हो गया।
आजादी के बाद सन् 1948 मंे श्रमिक नेता व्ही.व्ही. द्रविड़ रामसिंह वर्मा और गंगाराम तिवारीजी का इंटक द्वारा मजदूरों में वर्चस्व बढ़ रहा था। इन्होंने मजदूरों में उत्पन्न इस कलात्मक सांस्कृतिक विकास के प्रयत्न किये। नई-नई कल्पनाओं और भावनाओं से ओत-प्रोत वैचारिकता झांकी में लाई गई। प्लायवुड की कटिंग स्वयं मिल के या अन्य मजदूर ही करते थे और उनकी क्रियाओं के चलायमान रखने की तरकीब भी वे ही सोचते थे। इनमें कोई डिग्रीधारी इंजीनियर या विज्ञान अविष्कारक नहीं था। धीरे-धीरे प्लायवुड की अपेक्षा बाँस, घास-फूँस, पत्तो, डंठलों व लाठियों के सहयोग से मानवीय आकृतियां बनाई जाने लगी। चिंदों-चिथड़ांे और रंगीन धागों से इनके अंग-प्रत्यंग उभारे गऐ। इसके बाद पीली मिट्टी और गोबर-चूना अथवा रंगों से पोता जाने लगा।
सन् 2000-01 से झांकियों के माध्यम से नयापन
वर्तमान में चलित झांकियों में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया है और अब सुसज्जित सर्वसुविधायुक्त झांकियों का निर्माण होने लगा है। जिसमें नये-नये रूप में झांकियों को प्रदर्शित किया जाने लगा। साथ ही विगत 24 वर्षो से फूलों के माध्यम से भी झांकियों का निर्माण प्रारंभ हुआ जिसमें फूलों के द्वारा झांकियों को सज्जित किया जाने लगा। विसर्जन मार्ग पर झांकियों के सम्मान में एवं कलाकारों, अखाड़ों एवं करतब करने वालों के लिए मंचों के माध्यम से उन्हें सम्मानित कर हौसला अफजाई होने लगी। झांकियों के माध्यम से नित नये प्रयोग कर जनता को राष्ट्रीय एकता, सद्भावना देश भर में बनी रहे इस उद्देश्य को लेकर झांकियों का निर्माण लगातार जारी है।
(मदन परमालिया)
सामाजिक कार्यकर्ता
मो.नं. 98930-98950
